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क्या प्रकृति से खिलवाड़ का नतीज़ा है कोरोना वायरस का प्रकोप ?

कहते हैं प्रकृति ईश्वर का वरदान है और जब-जब प्रकृति से खिलवाड़ किया जाता है तो उसका परिणाम भी भुगतना ही पड़ता है। कभी विकास के नाम पर हरे-भरे पेड़-पौधों को काटना तो कभी धरती के मृदा संरक्षण को विकृत करना प्रकृति द्वारा दुनिया के दिए वरदान का दोहन करना है। निर्दोष जानवऱ, पक्षी और समुद्री जीवों को भी हमारी तरह जीने का अधिकार है लेकिन जब हम इनके अधिकारों का हनन करके खुद को सर्वोपरी समझ लेते हैं तो प्रकृति के प्रकोप का शिकार हमें बनना ही पड़ता है। आज पूरी दुनिया में कोरोना के कहर से लोग सहम गए हैं, लेकिन जानवरों से इंसानों तक इस वायरस को पहुंचाने का जिम्मेदार चीन है जिसकी गलतियों का परिणाम आज पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। दुनिया में कोरोना वायरस का लगातार बढ़ता संक्रमण कहीं न कहीं प्रकृति का इशारा है कि अगर प्रकृति से खिलवाड़ किया जाएगा तो दुनिया को परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

इस वायरस के फैलने के वैसे तो कई कारण है लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण है चीन में खाया जाने वाला भोजन। शायद लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि चीन में शायद ही कोई ऐसा जानवर होगा जिसे वहां के लोग बख्शतें हों। कोरोना वायरस का केंद्र चीन में सांप,चमगादड़, चूहे, बिल्ली, कुत्ते, ऊंट समेत सभी पशु पक्षियों और जलीय जीव-जन्तु का भक्षण भी किया जाता है। इसके साथ ही यहां के लोग जिंदा जानवर खाने के भी शौकीन हैं। घोंघा, झींगा, मछली, सांप, गधा, बंदर का कच्चा ब्रेन, चूहे के बच्चे, बतख का भ्रूण आदि कुछ ऐसे जानवर हैं जिन्हें चीन के लोग जिंदा खाना ही पसंद करते हैं। शायद आपको इन नामों को सुनकर ही घृणा हो रही होगी लेकिन चीन के लोग इन जानवरों को बड़े चाव के साथ खाते हैं। इससे अगर हम यह कहें कि कोरोना वायरस की समस्या इंसानों की ही देन है तो यह गलत नहीं होगा। सही शब्दों में  कहा जाए तो इस संक्रमण का जिम्मेदार मानव स्वयं है। इसके साथ ही इसका मुख्य कारण मनुष्य द्वारा क़ुदरत के बनाए नियमों के विरुद्ध जाना है। जब से इंसान ने स्वयं को सर्वोपरि समझना शुरू कर दिया है, तब से प्रकृति ने किसी न किसी रूप में लोगों को सबक सिखाने का काम किया है। हम सबकों यह समझना होगा कि क़ुदरत पर जितना अधिकार इंसानों का हैं उतना ही दूसरे जीवों का भी है। यदि हम उन्हें नुकसान ना पहुचाते हुए सम्मान देंगे तो सम्भवतः किसी भी प्रकार का संकट हमारे लिए नही पैदा होंगे।

छोड़ना होगा प्रकृति से लड़ना
दुनियाभर में महामारी का रूप ले चुके कोरोना संक्रमण अब भारत मे भी तेज़ी से पांव पसार रहा है। इससे बचने के लिए लोग अपने घरों में बंद है। यह समय का ही फेर है की इंसान पिंजरे में है और पक्षी खुली हवा में आज़ादी से सांस ले रहे है। एक वायरस ने दुनिया को यह समझाने का  काम किया है कि विज्ञान के क्षेत्र में बड़े-बड़े दावे करने वाला इंसान प्रकृति के आगे तिनका भर का हैं। अब हमारे विचार करने का समय आ गया है कि इस संकट के माध्यम से क़ुदरत हमें क्या संदश देना चाहती हैं ? अब समय आ गया है कि विश्व को अपने जीवनशैली और जीवन दृष्टि दोनों पर विचार करना होगा। प्रकृति का विध्वंस कर ऊँचे इमारतों, हवाई अड्डे और बहुमंजिला भवन का निर्माण ही केवल विकास की परिभाषा नहीं होती। बिना क़ुदरत को नुकसान पहुचाएं भी विकास संभव है। अब हमें यह मानना होगा कि प्रकृति का अधिक मात्रा में दोहन को विकास मानने वाली सोच पृथ्वी को महामारियों से नहीं बचा सकती।


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