Nirbhya Verdict
निर्भया के भय का हुआ अंत, आत्मा
को मिली शांति
साल 2012 की वो खौफनाक रात, जिसने देश को पूरी
तरह से झकझोर कर रख दिया, कोई नहीं भूल सकता है। आज एक बार फिर उस दर्दनाक रात की
यादें ताजा हो गई, जब सुबह-सुबह निर्भया के दोषियों को फांसी पर लटका दिया गया। 7 साल
3 महीने के इंतजार के बाद आखिरकार देश की बेटी निर्भया को इंसाफ मिल ही गया। खैर 7
साल का समय कम नहीं होता है उस परिवार के लिए, जिसने अपनी संतान को खोया और इंसाफ
के लिए 7 साल से अधिक संघर्ष किया। इस संघर्ष में ना जाने कितने दिन और साल गुजर
गए। बेशक निर्भया अब वापस नहीं आ सकती है, लेकिन अपने दोषियों की फांसी से आज उसकी
आत्मा को शांति जरूरी मिली होगी।
16 दिसंबर 2012 की उस रात को केवल निर्भया के
साथ दरिंदगी नहीं हुई बल्कि मानवता भी शर्मशार हुई, लेकिन कई मुश्किलों और परेशानियों के
बाद निर्भया को इंसाफ मिल गया। निर्भया को सात साल से ज्यादा का वक्त लग गया लेकिन
उसे इंसाफ मिला, इसके साथ ही देश में अभी भी प्रतिदिन बलात्कार की घटना तेजी से सामने
आती रहती है। जिनमें से कई लोग तो रिपोर्ट भी नहीं करते, जिसके कारण कई मामलें
सामने नही आ पाते। कभी समाज के भय से तो कभी बदनामी का डर तो कभी दोषियों को सजा
मिलने में सात साल का समय, शायद यही कारण है कि देश में आधे से ज्यादा मामलें सामने
नही आ पाते है। लेकिन उन्हें हर बक्त समय एक दर्द से गुजराना पड़ता है, तरह-तरह की
परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अगर किसी बेटी ने यह सोचा भी किसी उसे इंसाफ
के लिए लड़ना है और देश की अन्य बेटियों के लिए मिसाल पेश करनी है। ऐसे में उन्हें
घर, समाज और समुदाय के लोगों के ताने और उनके बनाए नियमों एवं ओझी सोच को सहन कर
पड़ता है। जिसके बाद भी न्यायापालिका से फैसले आने में इतना वक्त लग जाता है कि
शायद उसकी हिम्मत ही टूट जाती है। इससे बेहतर उन्हें चुप रहना और खूट-खूट रहना लगने
लगता है। इन सबके बावजूद किसी ने यह सब सहन कर कानूनी लड़ाई लड़ी भी तो उनके सामने
खड़े हो जाते कानून के कुछ जानकार, जो मानवाधिकार के नाम पर गुमराह करने का काम
करते है। यह तर्क बिल्कुल समझ के परे है कि हमें उनके प्रति मानवता का परिचय देने
की क्या आवश्कता है, जिन्होंने बालात्कार करते समय मानवता को बार-बार शर्मशार
किया।
फांसी के फंदे पर लटकते वक्त गर्दन का खिंचकर
टूटना और फिर प्राण निकलना बेशक ही अमानवीय है। इस विषय में सोचकर ही रूह कांप जाती है। सजा-ए-मौत का फैसला
लिखने के बाद न्यायाधीश अपनी कलम तोड़ देते हैं। दुनिया भर में फांसी की सजा पर
बहस जारी है। लेकिन फांसी की सजा ज्यादा जरूरी हो जाती है, उन जघन्य और घृणित अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों
के लिए जो मानवता को लहुलुहान कर देते हैं। और देश की बेटियों की आत्मा को छलनी कर देते
है। देश की बेटी निर्भया का मामला भी कुछ ऐसा ही था। जिसने सारे देश की आत्मा झकझोर दिया था। हमारा मन भी करुणा के भाव से खाली नहीं हैं, लेकिन निर्भया के साथ हुआ जघन्य अपराध इतना घिनौना और निर्मम था कि उसके दोषियों के लिए फांसी ही उपयुक्त सजा है। अगर हम स्त्री सुरक्षा की बात
करते हैं, बेटियों को इस निर्मम अपराध से बचाना चाहते हैं, तो उसके लिए हमें बलात्कारियों के बारे में निष्ठुर होना चाहिए।
क्यों करना पड़ता है इंसाफ
के लिए इंतजार
सात सालों के इंतजार के बाद निर्भया को तो इंसाफ
मिल गया। लेकिन सवाल यह है कि देश के बेटियों को इंसाफ मिलने में आखिरकार इतना समय
क्यों लग जाता है ? यह हमारे कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। साथ ही यह कही-ना-कही न्यायपालिका
की कार्य प्रणाली पर भी सवालिया निशान है। हमारे संविधान में यह निहित है कि भले हजारों
अपराधी झूठ जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए। कुछ हद तक यह सही भी
है, लेकिन जब बात जघन्य अपराधो की होती है तो यह सिद्धांत बेमानी सा लगता है।
निर्भया के अपराधियों ने जो निर्मम अपराध किया, उसके लिए इतने सालों का समय देना
और उनका भरण-पोषण करना बिल्कुल सही नहीं है। दोषी करार होने के बाद भी सजा देने
में इतना समय और सजा मिलने के बाद उसके क्रियान्वयन में लगा समय निर्भया और उसके
परिवार को केवल दर्द के आलवा कुछ नही दिया। इसके बाद भी मानवाधिकार के नाम पर और
कानून के हर एक पन्ने का इस्तेमाल कर या यूं कहे कि दुरुपयोग करके उन्हें बचाना
कहां तक सही है। इन चार दोषियों को तो सजा मिल गई लेकिन अपराध के समय अपने आप को
नाबालिग बताने वाले पांचवां अपराधी अब खुली हवा में आज़ादी की सांस ले रहा है। ये
तर्क किसी भी प्रकार से सही नहीं है कि अपराधी बालात्कार के समय नाबालिग था। निर्भया
के साथ अपराध और निर्ममता करते समय वह नाबालिग नहीं था, लेकिन जब सजा की बारी आयी
तो वह नाबालिग हो गया। यह हमारे संविधान की शायद विडंबना ही है कि आज जब निर्भया
के सभी दोषियों को फांसी मिल गई तो एक अन्य अपराधी आज़ाद घूम रहा है। इसमें सुधार
की सख्त आवश्कता है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें